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Showing posts with the label sanskrit gurukul

Kritanna food Group of prepared Food-Ashtanga Hridyam-Part-3

Hello learners. Welcome to Sanskrit Gurukul. In this post, we will learn about cooked food prepared from rice and other grains, such as Manda, Peya, Vilepi, and Odana . Each differs in their liquid-to-solid ratio. This is the third part of Chapter 6 , Annaswarupa Vijnanlya Adhyaya of Ashtanga Hridyam, written by Acharya Vagbhta. मण्ड-पेया-विलेपीनाम् ओदनस्य च लाघवम् ॥ 26 ॥ यथा-पूर्वं शिवस् तत्र मण्डो वातानुलोमनः । तृड्-ग्लानि-दोष-शेष-घ्नः पाचनो धातु-साम्य-कृत् ॥ 27 ॥ स्रोतो-मार्दव-कृत् स्वेदी संधुक्षयति चानलम् । Manda, peya, vilepi and odana are preparations of rice or other grains cooked food in water.  Manda - The thin fluid resembling water, drained out immediately after boiling, is known as manda.  Peya – slightly thicker than manda, but still, only liquid is peya;  Vilepi – the next stage with more of solid grain and less of fluid is called vilepi, and  Odana – the last stage, which is solid without a fluid portion, is known as odana.  Manda...

Ayushkamiya Sutrasthana- Ashtanga Hridyam part 4

Subject: Ashtanga hridyam Section: Sutrasthana Chapter: Ayushkamiya Hello learner, Welcome to Sanskrit Gurukul. In this post, we will cover the last part of Ayushkamiya Chapter of Ashtanga Hridyam, written by Acharya Vagbhata. Chikitsa Chatushpada (four limbs of treatment) In this shloka of the Ayushkamiya Chapter of Ashtanga Hridyam, Acharya Vagbhata explains about the 4 important pillar of treatment in Ayurveda or in general. भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । चिकित्सितस्य निर्दिष्टं, प्रत्येकं तच्चतुर्गुणम् ॥२७৷৷ The four limbs od treatment are Bhishag (Doctor), Dravya (medicine), upastha (nurse), and rogi (Patient). Each of them have further four qualities. Note: The hope of complete success in treatment rests on these four . These four have further four qualities - in this way this treatment has sixteen qualities. Vaidya is the main one among these four, because without him these three stages are meaningless, and if he is capable then he can ext...

अनुमान प्रमाण- पदार्थ विज्ञान- Anuman praman- Padarth vigyan

ज्ञान की अनुभूति 2 प्रकार की होती है 1) प्रत्यक्ष 2) अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष ज्ञान का बोध इंद्रियार्थसन्नि-कर्ष से होता है और अप्रत्यक्ष ज्ञान का बोध अनुमान, उपमान, युक्ति, शब्द प्रमाण आदि से होता है। 'प्रत्यक्षं हि अल्पं अनलपम अनलपम अंबृद्धम्'। (चरक) प्रत्यक्ष का दायरा और सीमा बहुत कम है और प्रत्यक्ष का अधिक, इसलिए दर्शन और आयुर्वेद में अनुमान आदि प्रमाणों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाती है। अनुमान प्रमाण को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और इसे एक स्वतंत्र प्रमाण के रूप में माना जाता है, लेकिन सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने के लिए इसमें प्रत्यक्ष ज्ञान या आप्टोपदेश का पूर्व अनुभव होना चाहिए। अनुमान (निरुक्ति) की व्युत्पत्ति अनुमान शब्द "अणु" उपसर्ग, "म" धातु और "ल्युट" प्रत्यय से बना है। 1) 'अनु= पश्चात् कस्य चिद् ज्ञानान्तरं जायमानमिति ज्ञानम् अनुमितिः'। 2)अनु (पश्चात्) मीयते (ज्ञयते) इति अनुमानम्'। 3) अनु = पश्चात् (बाद में) मान =ज्ञान  अनुमान, का अर्थ है पश्चात् ज्ञान (पिछले प्रत्यक्ष ज्ञान या आप्तोपदेश के आधार पर बाद में माना ज...

कर्म विज्ञानं- Padarth vigyan Notes- Ayurveda Bams

प्रिय शिक्षार्थी, संस्कृत गुरुकुल में आपका स्वागत है। इस पोस्ट में हम कर्म विज्ञानं का अध्ययन करेंगे। यह विषय पदार्थ विज्ञान के नोट्स, बीएएमएस प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। इसके पिछले अध्याय, गुण निरूपण में, हम पहले ही निम्नलिखित विषयों को शामिल कर चुके हैं: गुण निरूपण आयुर्वेद मे गुण विज्ञान आयुर्वेदोक्त 41 गुणों के वर्गीकरण गुर्वादि गुण (भाग -1) गुर्वादि गुण (भाग – 2) आध्यात्मिक, परादि, वैशेषिक गुण कर्म विज्ञानं कर्म को दर्शनशास्त्र में तीसरा और आयुर्वेद में पांचवां स्थान दिया गया है। यह गुण सहित 9+द्रव्य की आश्रयी है। यह मुर्त द्रव्य में देखा जाता है, यह संयोग और विभाग के लिए निमित्त करण है, यह पूर्व-देश-वियोग और उत्तर-देश-संयोग द्वारा प्रकट होता है। इसे गति (गतिशीलता) या क्रिया (क्रिया) के रूप में दर्शाया गया है। कर्म निरुक्ति क्रिया शब्द की उत्पत्ति कृ - विक्षेप, धातु से हुई है, जिसका अर्थ है क्रिया या गति। समानार्थी शब्द कर्म, क्रिया, गति, कार्य, कार्य-समरम्भ, प्रयास, प्रवृत्ति,चेष्टा, कर्मफल, चिकित्सा आदि। क...

गुर्वादि गुण (भाग - 2)

प्रिय शिक्षार्थी, संस्कृत गुरुकुल में आपका स्वागत है। इस पोस्ट में हम गुर्वादि गुणों का अध्ययन करेंगे। यह विषय पदार्थ विज्ञान के नोट्स, बीएएमएस प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। 10 गुर्वादि गुण हम पिछले पोस्ट मे अध्ययन कर चुके है। इसके पिछले अध्याय, द्रव्य निरुपन में, हम पहले ही निम्नलिखित विषयों को शामिल कर चुके हैं: Related topics from the Dravya Nirupana Chapter Dravya (द्रव्य) Panchamahabhuta- पंचमहाभूत Akasha Mahabhuta (आकाश महाभूत) Vayu MahaBhuta (वायु महाभूत) मृदु गुर्वादि गुण (जो कोमलता के लिए जिम्मेदार है) व्याख्या 'यस्य द्रव्याणि श्लथने कर्माणि शक्तिः स मृदुः' । (अ.हृ.सू. 1.18; हेमाद्रि) जिस गुण के कारण शिथिलता (कोमलता) आती है, उस गुण को मृदु गुण कहते हैं। महाभूत प्राधान्य मृदु गुणयुक्त द्रव्यों में जल और आकाश महाभूत की प्रधानता होती है। गुणकर्म दाहेत्यादि (दाहपाककरस्तीक्ष्णः स्रावणो, मृदुरन्यथा ) अन्यथेति अदाहपाककरोऽस्त्रावण इत्यर्थ । सु.सू.46/518 पर डल्हण टीका। अदाहकर - मृदु गुण दाह का नाश करता है। (जलन कम करता है) अपा...