ज्ञान की अनुभूति 2 प्रकार की होती है 1) प्रत्यक्ष 2) अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष ज्ञान का बोध इंद्रियार्थसन्नि-कर्ष से होता है और अप्रत्यक्ष ज्ञान का बोध अनुमान, उपमान, युक्ति, शब्द प्रमाण आदि से होता है। 'प्रत्यक्षं हि अल्पं अनलपम अनलपम अंबृद्धम्'। (चरक) प्रत्यक्ष का दायरा और सीमा बहुत कम है और प्रत्यक्ष का अधिक, इसलिए दर्शन और आयुर्वेद में अनुमान आदि प्रमाणों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाती है। अनुमान प्रमाण को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और इसे एक स्वतंत्र प्रमाण के रूप में माना जाता है, लेकिन सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने के लिए इसमें प्रत्यक्ष ज्ञान या आप्टोपदेश का पूर्व अनुभव होना चाहिए। अनुमान (निरुक्ति) की व्युत्पत्ति अनुमान शब्द "अणु" उपसर्ग, "म" धातु और "ल्युट" प्रत्यय से बना है। 1) 'अनु= पश्चात् कस्य चिद् ज्ञानान्तरं जायमानमिति ज्ञानम् अनुमितिः'। 2)अनु (पश्चात्) मीयते (ज्ञयते) इति अनुमानम्'। 3) अनु = पश्चात् (बाद में) मान =ज्ञान अनुमान, का अर्थ है पश्चात् ज्ञान (पिछले प्रत्यक्ष ज्ञान या आप्तोपदेश के आधार पर बाद में माना ज...