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Showing posts from January, 2023

पुरुष -पदार्थ विज्ञान - आयुर्वेद

शरीर में जो आत्मा मौजूद होती है उसे पुरुष के नाम से जाना जाता है।शरीर के चेतन धातु को पुरुष के नाम से जाना जाता है, आयुर्वेद में शारीर-सहित आत्मा को पुरुष (शरीर आत्मा) के रूप में जाना जाता है। एकधात्त्वामक पुरुष चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरूषसंज्ञकः।  शरीर की आत्मा को चेतन धातु या एकधात्त्वामक पुरुष के रूप में जाना जाता है जो निर्विकार है। द्विधातु पुरुष अग्नि-सोम और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के आधार पर पुरुष दो प्रकार के होते हैं। त्रिधातु पुरुष त्रिदंड रूप, त्रिगुणात्माका, त्रिदोषात्मक। षड्धातुज पुरुष जीवों का निर्माण पंचमहाभूत और आत्मा से हुआ है, इसलिए इसे षड् धातुवात्मक पुरूष कहते हैं। त्रयोदशा धातु पुरुष त्रिदोष सप्त धातु त्रिमाला, तेरह कारक शरीरा-धाराक भाव हैं, इसलिए इसे त्रयोदशा धातु पुरुष के नाम से जाना जाता है। सप्तदशा धातु पुरुष आत्म, एकादशी इंद्रिय पंचमहाभूत, को सप्त-दशा धातु पुरुष के रूप में जाना जाता है। क्रमांक  पुरुष भेद तत्व 1 एकाधत्त्वात्मक केवल चेतना धातु 2 द्विधात्वात्मक अग्नि और सोम या क्षेत्र और क्षेत्...

आत्मा द्रव्य- पदार्थ विज्ञान -आयुर्वेद

धरती जिसे मृत्यु लोक भी कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु धरती पर नष्ट होती है। हमारा शरीर जो की पंचमहाभूतों का बना हुआ है, जिसमे आत्मा निवास करती है। यह आत्मा भी अपने पिछले जन्म के पाप पुण्य के आधार पर जीवन व्यापन कर जन्म मरण के चक्र मे घूमती रहती है। यह पंचभौतिक शरीर, चाहे वो मनुष्य, पक्षी, या पशु हो (योनिज) तथा पेड़-पौधे आदि हो सभी मे आत्मा के कारण ही शक्ति है। शरीर तो एक माध्यम मात्र है जिसके द्वारा जीवात्मा अपने कर्मानुसार सुख दुख का अनुभव करती है । गीत मे भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा है इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद् यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।। गीता 13। 1 आत्मा शब्द निरुक्ति 'अत सातत्य गमने' धातु से आत्मा शब्द बना है, जिसका अर्थ है निरन्तर गति करने वाला । अत्- जो सभी को व्याप्त करता है । अप् - जो निरन्तर गति करता है । अतति सकलं व्याप्नोति इति आत्मा । जो सम्पूर्ण शरीर को या विश्व को व्याप्त करता है, आत्मा कहते हैं। आत्मा के पर्याय जीव, चेतना धातु, देहि, शरीरि, द्रष्टा, क्षेत्रज्ञ, पुरूष, ज्ञ, सर्व...