Dik (Disha)- दिक् (दिशा)

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दिक् (दिशा) निरूपण

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दिशा को आयुर्वेद मे दिक् (dik) भी कहा जाता है। यह 9 कारण द्रव्यों मे से एक है । स्वस्थवृत्त में इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिलते है । शौच करते समय मुख किस दिशा में हो; किस दिशा की ओर बैठकर खाना चाहिए; किस दिशा की ओर सिर रखकर सोना चाहिए; किस दिशा में बैठकर पूजन आदि करना चाहिए आदि बातों का विस्तृत वर्णन स्वस्थवृत्त के अन्तर्गत मिलता है। रोगियों के लिए भी दिशा की मर्यादा के अन्तर्गत अनेक व्यवस्थाएँ आयुर्वेद में निर्दिष्ट की गयी हैं । औषधियों के संग्रह के लिए किस दिशा की वनस्पति हो; किस दिशा की ओर मुँहकर इसे तोड़ना चाहिए, किस दिशा की ओर मुँहकर इसका सेवन करना चाहिए आदि-आदि बातों का उल्लेख भी आयुर्वेद में प्राप्त होता है।

यहाँ तक कि मकान आदि भी बनवाना हो तो उसका मुख्य प्रवेश द्वार किस दिशा में हो और किस दिशा में नही आदि का भी वर्णन आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त में प्राप्त होता है। जेन्ताक-स्वेदन के लिए निवासस्थान से पूर्व या उत्तर दिशा की ओर भूमि का चयन करना चाहिए ( च० सू० १३०४६) । कुटीप्रावेशिक – रसायन में कुटी का निर्माण पूर्वोत्तर दिशा में होना चाहिए। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके औषधियों का संग्रह करना चाहिए । उत्तर दिशा ( हिमालय ) में उत्पन्न वनौषधियाँ -उत्तम प्रकार की होती हैं। तो इस प्रकार हम देख सकते हैं कि आयुर्वेद और रोगियों के उपचार के संबंध में दिशा का ज्ञान कितना महत्वपूर्ण है.

इस blog post मे हम दिशा के बारे मे पूर्ण रूप से ज्ञान अर्जित करेंगे और जानेगे की आयुर्वेद मे दिशा के और क्या महत्व है। यह post  पदार्थ विज्ञान के तीसरे अध्याय द्रव्य निरूपण का एक भाग है। 

दिक् शब्द की व्युत्पति 

1) प्राची का अर्थ है पूर्व दिशा या पूर्व, उदयाचल में सूर्योदय की दिशा।

2) प्रपाची का अर्थ है पश्चिम, अस्ताचल में सूर्यास्त की दिशा।

3) उदिचि का अर्थ है  उत्तर, सूर्य प्रसार करते समय उच्च सीमा लेता है या यह मेरु पर्वत (पर्वत) के पूर्व या निकटवर्ती क्षेत्र की ओर मुख करते हुए बाईं ओर होता है।

4) अवाची अर्थात दक्षिण, प्रसार करते समय सूर्य नीची श्रेणी लेता है या पूर्व की ओर मुख करके दाहिनी ओर होता है।

दिक (दिशा) शब्द के पर्याय

दिक, ककुभ, काष्ठा , आशा, हरित, दिशा के पर्याय है। 

लक्षण 

तर्कसंग्रह के अनुसार 

यह प्राची (पूर्व), प्रपाची (पश्चिम), उदीचि (उत्तर), अवाची (दक्षिण) है, इस व्यवहार का जो द्रव्य है, वह दिशा है। वह एक, नित्य, तथा सर्वव्यापक है। 

वैशेषिक दर्शन के अनुसार 

जिससे इसकी अपेक्षा यह दूर और यह समीप है, इस प्रकार का ज्ञान होता है वह दिक (दिशा) है  

दिक के भेद 

  • प्राची (पूर्व दिशा)
  • प्रतीची (पश्चिम)
  • अवाची (उत्तर)
  • उदीची (दक्षिण)
  • ईशान कोण (पूर्व- उत्तर)
  • वायव्यकोण (उत्तर -पश्चिम)
  • नैऋत्य कोण (पश्चिम- दक्षिण)
  • आग्नेय कोण (दक्षिण -पूर्व)
  • उध्रव (आकाश)
  • अधः (पाताल)

दिक के गुण 

संख्या, परिणाम, पृथकत्व,संयोग, विभाग।

दिक का आयुर्वेद मे महत्व 

शरीर रचना और क्रिया की दृष्टि से

  • दिशाओं के आधार पर शरीर अंगों के स्थान का निर्धारण करना जैसे हृदय के नीचे दक्षिण की ओर यकृत और क्लोम होते हैं और वाम और प्लीहा और फप्फुस होते हैं। (सु.शा. 4/31)
  • मर्मो के स्थान निर्धारण में भी दिशाओं का उपयोग होता है। 
  • दोषों की प्राकृत गति का निर्धारण भी दिशा के आधार पर किया जा सकता है जैसे अपान वायु की गति अधः दिशा में होती है, उदान वायु ऊर्ध्व गति करता है। 
  • कुछ शरीर अंगों का नामकरण भी दिशा के आधार पर किया गया है जैसे उत्तरगुद, अधरगुद, आदि।

रसशास्त्र और द्रव्यगुण की दृष्टि से

दिशाकार्य
पूर्व दिशारसलिंग की स्थापना
पश्चिम दिशाक्षालन का कार्य
उत्तर दिशाधातुकर्म
दक्षिण दिशा पाषाण कर्म
ईशान कोणनिर्मित कल्पों का संग्रहण
वायव्य कोणसुखाने का कार्य
नैऋत्य कोणशस्त्रकर्म
आग्नेय कोणअग्निकर्म

दिशाओं का प्रभाव द्रव्यों पर भी होता है।

उत्तर दिशा की ओर हिमालय पर्वत पर प्राप्त द्रव्य अधिक गुणवान और वीर्यवान होते हैं।

औषधीयों का संग्रह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।

रोग निदान और चिकित्सा की दृष्टि से

  • रोगों के नामकरण में दिशाओं का आधार लिया जाता है- जैसे ऊर्ध्वग और अधग रक्तपित्त, ऊर्ध्वग और अधग अम्लपित्त आदि।
  • दोषों की शरीर में गति बताने के लिये दिशाओं का आधार लिया जाता है। जैसे उदावर्त में वायु की गति ऊर्ध्वं दिशा में होती है।
  • व्याधि के भेद करते समय दिशाओं का आधार लिया जाता है जैसे वाम एवं दक्षिण पक्षाघात ।
  • अरिष्ट के वर्णन में स्वप्न सम्बन्धी लक्षणों में विविध दिशाओं का वर्णन आता है जैसे यदि व्यक्ति स्वप्न में कुत्ते, ऊँट या गधे पर बैठकर दक्षिण की ओर जाता हुआ दिखाई दे, तो वह राजयक्ष्मा व्याधि से ग्रस्त होकर मृत्यु की ओर बढ़ता है।
  • जेन्ताक स्वेद के लिए कुटी का स्थान पूर्व या उत्तर की दिशा में स्थित भूमि पर होना चाहिए।

सुतिकागार का मुख भी पूर्व या उत्तर की दिशा में होना चाहिए।

रोगी के लिये दिशा का महत्व

  • दिशा विशेष से चलने वाली वायु का दोष धातु एवं मलों पर प्रभाव प्रदर्शित करने हेतु दिशा की आवश्यकता होती, है. जैसे- पूर्व की वायु रक्त पित का प्रकोप करती है एवं पश्चिम की वायु वात एवं कफ का सम होने वाली हवा आरोग्य उत्पन्न करती है।
  • औषध के लिये दिशा जैसे- आयुर्वेद में हिम प्रदेश की वनस्पतिय शीत गुण के लिये उतम तथा विन्ध्याचल की औषधियाँ उष्णवीर्य प्रधानता के लिये प्रसिद्ध है

स्वस्थ के लिये दिशा का महत्त्व

  • कुटि आदि के द्वारा सूतिकागार, कुमारागार, चिकित्सालय, निवारा स्थान, घर में पशु आदि के स्थान, पाकशाला का स्थान आदि के स्थान बताने, इनकी मूब स्थिति किस तरफ होनी चाहिये आदि का भी दिशा से निर्देश किया गया है। रसशास्त्र में रसशाला निर्माण हेतु दिशा का विवरण प्रस्तुत करते हुये प्रत्येक वस्तु का स्थान, कौन सा हो इसका निर्देश दिशा द्वारा ही किया गया है।
  • एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने में दिशा निर्देश की आवश्यकता देखी जाती है।
  • दिशा ज्ञान के आधार पर ही जलयान एवं वायुयान आदि की प्रक्रिया सम्मत है

दिशा के आधार पर वायु के गुण 

पूर्व दिशा की वायु के गुण 

पूर्व दिशा की वायु मधुर, स्निग्ध और लवण होती है। गुरू, दाह उत्पन्न करने वाली और रक्तपित्त को बढ़ाने वाली होती है क्षत विष पीड़ित, व्रणी, कफ विकार से ग्रस्त रोगियों के रोगों को बढ़ाती है। बात प्रकृति वाले, श्रान्त ( थके हुए) और जिनका कफ सूख गया है, ऐसे व्यक्तियों के लिये हितकारी है। किन्तु इन्हीं में यदि व्रण हो तो उनके व्रण में क्लेद को बढ़ाती है।

पश्चिम दिशा की वायु के गुण 

पश्चिम दिशा की वायु विशद, रूक्ष, परूष, खर, स्नेह और बल का हास करती है। तीक्ष्ण होने से कफ और मेद का शोषण करती है। यह वायु सा प्राणों का हरण और शरीर का शोषण करने वाली है।

उत्तर दिशा की वायु के गुण –

उत्तर दिशा की वायु स्निग्ध, मृदु और मधुर होती है। इसका कपाय अनुरस होता है, शीत होती है और दोषों को प्रकुपित नहीं करती है। स्वस्थ व्यक्तियों में क्लेदकारक और बलवर्धक है। यह क्षीण, क्षय और विष से पीड़ितों के लिये विशेष रूप से लाभकारी है।

दक्षिण दिशा की वायु के गुण-

दक्षिण दिशा की वायु मधुर, अविदाही, कषाय अनुरस और लघु होती है। यह श्रेष्ठ होती है और चक्षुष्य है तथा बल का वर्धन करती है। रक्तपित्त का प्रशमन करती है और वात को प्रकुपित नहीं करती है।

दिशाओं का नदियों के जल पर प्रभाव

नदी की दिशाजल के गुणकर्म
पश्चिमाभिमुखपथ्य, लघु ।
पूर्वाभिमुखअप्रशस्त, गुरू।
दक्षिणाभिमुखअतिदोषल, साधारण 

दिशा और काल में साम्य

  • दिशा और काल दोनों नित्य है, विभू है और स्वतन्त्र है। 
  • दोनों अनादि और अनन्त है।
  • दोनों की संख्या एक है और भेद औपाधिक है।
  • दोनों में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये 5 गुण होते हैं।

दिक तथा काल मे भेद 

दिशाकाल
प्राची आदि व्यवहार के हेतू को दिशा कहते हैं।अतीतादि व्यवहार के हेतू कोकाल कहते हैं।
दिशा का विभाग करने काआधार मूर्त वस्तु (सूर्य) है।काल के विभाग का आधार गति है।
उपाधि भेद से दिशा के 10 भेद है।उपाधि भेद से काल के 2 भेद है। 

Dik nirupan

Disha is also called Dik in Ayurveda. It is one of the 9 Karana dravyas. Many examples of this are seen in the health circle. In which direction should the face be while defecating? In which direction should one sit and eat? In which direction one should sleep by keeping his head; The detailed description of things like sitting in which direction should be worshiped etc. is found under Ayurveda. Many arrangements have been specified in Ayurveda for patients also within the limits of direction. In which direction should the vegetation be for the collection of medicines; The direction towards which it should be broken, the direction towards which it should be consumed, etc., are also mentioned in Ayurveda.

Even if a house etc. is to be built, then in which direction should its main entrance be and in which direction it should not be, etc. is also described in Ayurvedic health. For Jentak-Swedan, the land should be selected towards the east or north direction from the residence (Ch. Su. 13046). Kutipraveshik – The hut’s construction in Rasayan should be in the northeast direction. Medicines should be stored by facing the east or north. The herbal medicines produced in the north direction (Himalayas) are of the best type. So we can see how important is the knowledge of Disha in respect to ayurveda and the treatment of patients. In this blog post, we will gain complete knowledge about the direction and know what is the importance of direction in Ayurveda. This post is a part of the third chapter of Padarth Vigyaan, Dravya Nirupan

Vyutpatti of the word Dik (Disha)

  • Prachi means Purvadisha or East, the direction of sunrise at Udayāchala.
  • Prapachii means Pashchima or west, the direction of sunset at Astāchala.
  • Udichi means Uttara or North, the sun takes a high range while propagating or it is on the left side while facing towards the east or nearer area of Meru parvata (mountain).
  • Avachi means Dakshina or south the sun takes a low range while propagating or it is on the right side while facing east

Synonyms of the word Dik (Disha)

Dik, Kakubhah, Kashtha, Asha, and Harit, are synonymous with Dik

Features of Dik (Disha)

According to tarksangrah.

It is Prachi (east), prapachi (west), udichi (north), avachi (south), and the substance of this behavior is Disha. He is one ((Eka), eternal (Nitya), and all-pervading.

According to Vaisheshika Darshan

From which this kind of knowledge is known that this is far and this is near, that is Dik (direction).

Upādhi bheda of dik

  • Prachi (East direction)
  • Pratichi (West)
  • Avachi (North)
  • Udichi (South)
  • Ishāna (East-North)
  • Vāyavya (North-West)
  • Naitriya (west-south)
  • Agneya (southeast)
  • Udhrava (Sky)
  • Adh (underworld)

Qualities of Dik

  • Sankhya,
  • Parimana,
  • Prithaktwa,
  • Samyoga,
  • Vibhaga.

Importance of Dik in Ayurveda

Anatomically and functionally

Determining the location of body organs on the basis of directions like below the heart are the liver and colon on the south and on the left are the spleen and lungs. (S.S. 4/31)

Directions are also used in determining the location of Marmo.

The natural movement of defects can also be determined on the basis of direction, the movement of Apan Vayu is in the downward direction, and Udan Vayu moves vertically.

Some body parts have also been named on the basis of direction like Uttaragud, Adhargud, etc.

Directions also have an effect on dravya

  • The liquids obtained on the Himalayan mountain towards the north are more qualitative and seminal.
  • Medicines should be stored facing east or north.

Rognidan and medical point of view.

  • The directions are the basis for the nomenclature of diseases- such as upper and lower raktapitta, upper and lower acid bile, etc.
  • To tell the movement of defects in the body, the directions are taken as the basis. For example, the speed of air in the wind is in the vertical direction.
  • The directions are taken as the basis while making distinctions of diseases, such as left and right paralysis.
  • In the description of Arishta, there is a description of various directions in dream-related symptoms, such as if a person is seen sitting on a dog, a camel, or a donkey and going towards the south, then he suffers from Rajyakshma disease and moves towards death.

Properties of vayu depending on Dik (Disha)

Properties of east vayu

The air of the east is sweet, aliphatic, and salty. Guru (Heavy),  is the cause of inflammation and increases blood bile, it increases the diseases of the patients suffering from Kshata poison, Vrani, and Kapha disorders. It is beneficial for people with weak natures, tired, and those whose phlegm has dried up.

Properties of west Vayu

The wind of the west direction is vivid, rough, manly, and harsh, and reduces affection and strength. Being sharp, it exploits phlegm and obesity. This air is going to take away life and exploit the body.

Properties of the north wind

The air in the north direction is aliphatic, soft, and sweet. Its action is astringent, cool, and does not aggravate the doshas. It is carminative and tonic in healthy persons. It is especially beneficial for those suffering from emaciation, decay, and poison.

properties of the south wind

The air in the south direction is sweet, non-partial, astringent, and short. It is superior and eye-catching and increases strength. It pacifies Raktapitta and does not aggravate Vata.

Effect of directions on river water

The direction of the riverProperties of water
West facingPathya, short.
East facingUnhappy, Guru.
South facingdefective, ordinary
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